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चौरासी लाख योनियों

*अंजन का अर्थ है माया और निरंजन कहते है माया से रहित को !*
*कहते है – वह मालिक सबका आदि और सबका अन्त है – वह माया से रहित है ! अब प्रश्न उठता है कि दुनिया जन्मती और मरती है -* *क्या वह भी जन्मता और मरता है ?*

*कहते है नहीं ,* *वह लाफानी है , अविनाशी है , सबके बीच में रहता हुआ भी सबसे निराला या अलग है ! उस परमात्मा की न कोई कौम है न मजहब है , न उसका कोई रूप-रँग है न वर्ण है ! वह न हिन्दू है न मुसलमान न सिक्ख है न ईसाई !*

*वह सबका परमेश्वर है – मालिक है ! कुल – आलम को उसने अपने हुक्म , शब्द से पैदा किया है ! जब उसकी कोई कौम कोई मजहब नही फिर हम क्यों लड़ते है ?*

*लख चौरासी जोन सबाई माणस कौ प्रभ दीई बड़ियाई*

*वाणी का एक एक शब्द करोड़ करोड़ रूपये का है और हृदय में अंकित करने योग्य है !*

*गुरु साहिब कहते है सारी सृष्टि चौरासी लाख योनियों में बटी हुई है जो इस प्रकार है तीस लाख प्रकार के पेड़ — सत्ताईस लाख प्रकार के कीड़े – पतंगे — चौदह लाख प्रकार के पक्षी — नौ लाख प्रकार के पानी के जीव*

*– और चार लाख प्रकार के देवी – देवता , भूत – प्रेत , यक्ष – किन्नर , गन्धर्व , इन्सान , हैवान आदि ! यह सँसार चौरासी लाख योनियों का जेलखाना है ! गुरु साहिब कहते है यदि कोई ऊँची से ऊँची पदवी , सबसे उत्तम योनि है तो वह मनुष्य की योनि है ! मनुष्य जन्म पाकर हम इस जेलखाने से निकल सकते है , इसके सिवाय चौरासी से निकलने के लिए और कोई जन्म नही है !*

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