आँसु एक सहज प्रार्थना है

तुम्हें अगर प्रभु का नाम सुनकर आँसु आते हैं, अगर तुम्हें उसके नाम को लेकर आँसु आते हैं तो जिन्दगी के यही पल सार्थक हैं, मंगलदायी हैं । ये पल प्रभु की कृपा हैं, ये पल उसकी करुणा का प्रसाद हैं ।

आँसुओं को रोकना मत, उनको बहने देना, उन आँसुओं में बहुत कुछ कूडा़ कर्कट तुम्हारा बह जाएगा । तुम पीछे तरोताजा अनुभव करोगे । जैसे कि कोई स्नान हो गया हो । आँखों से कंजूसी मत करना, बहने दो इन आँसुओं को, ये आँसु भीतर उठती किसी रसधार की खबर हैं । बस, इतना ख्याल रहे कि इन आँसुओं को अपनी मस्ती जरुर बना लेना । इन आँसुओं को अपना रस, अपना आनन्द बनाना है ।

उस प्रभु के लिए यही तुम्हारी सरल, सहज और निर्मल प्रार्थना है । अगर तुम खुलकर हृदय से उसके लिए रोना सीख लेते हो तो समझो इससे आगे कुछ और नहीं चाहिए, उसको रिझाने के लिए । क्योंकि रोते-रोते ही हँसना आ जाता है । उसके लिए रोना ही सबसे सरल और सबसे सहज साधन है, इसलिए उसको रिझाने के लिए रोओ ।

दरअसल आँसुओं से बड़ी और कोई प्रार्थना नहीं है । इसलिए हृदय पूर्वक रोओ । आँसु निखारेंगे तुम्हें, बुहारेंगे तुम्हें, जो व्यर्थ है वह बाहर निकल जाएगा । जो सार्थक है, निर्मल है, वह स्फटिक मणि की भांति स्वच्छ होकर भीतर जगमगाने लगेगा ।
रे मन ! अब तू भी प्रभु नाम में डूबजाना

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